एशियाई बाजारों में भारी गिरावट: ट्रंप के टैरिफ ऐलान से झटका, हांगकांग की AI रैली ने संतुलन बदला

ट्रंप के टैरिफ और एशिया की घबराहट: गिरावट के बीच कुछ बाजार चमके

अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए टैरिफ प्लान ने एशियाई शेयर बाजारों को हिला दिया। ऐलान के तुरंत बाद जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया में तेज बिकवाली दिखी। जापान का निक्केई 225 शुरुआती मिनटों में धड़ाम हुआ, हालांकि बाद में संभला और साल की शुरुआत से अब तक मामूली 1% ऊपर बना रहा। दूसरी तरफ हांगकांग का हैंग सेंग अलग रास्ते पर चला—पहले फिसला, फिर चीनी टेक और AI रैली के सहारे YTD करीब 25% उछला। यही कंट्रास्ट निवेशकों की दुविधा भी दिखाता है: टैरिफ की लागत बनाम टेक-साइकिल की ताकत।

ट्रंप ने अपने ‘लिबरेशन डे’ संदेश में उन देशों पर ऊंचे आयात शुल्क का खाका रखा जिनके साथ अमेरिका का ट्रेड डील नहीं है। प्रस्तावित दरें 24% से 49% तक हैं। अधिकांश देशों के लिए लागू होने की तारीख 1 अगस्त बताई गई, जबकि चीन के लिए 12 अगस्त की समय-सीमा का जिक्र हुआ। साथ ही ये चेतावनी भी आई कि अगर कोई देश पलटवार में अपने टैरिफ बढ़ाता है तो अमेरिका और ऊंचे शुल्क लगा सकता है। ऐसे संकेतों ने बाजार को एक झटके में जोखिम-से-दूर मोड पर डाल दिया।

शॉर्ट टर्म में पिटाई सबसे ज्यादा एक्सपोर्टर्स और टेक-हार्डवेयर में दिखी—सेमीकंडक्टर्स, ऑटो, इंडस्ट्रियल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स की सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ने का डर उभरा। सियोल का KOSPI और सिडनी का ASX भी इसी वजह से तेज उतार-चढ़ाव से गुजरे। ताइवान में बड़े चिप नामों की वजह से घबराहट बढ़ना स्वाभाविक था, क्योंकि अमेरिकी मांग और ग्लोबल वैल्यू चेन का वहां सीधा कनेक्शन है। इसके उलट, घरेलू मांग पर टिकी यूटिलिटीज, बैंक, टेलिकॉम और रियल एस्टेट जैसी सेक्टरों में गिरावट सीमित रही—डिफेंसिव वैल्यू का फायदा मिला।

गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों का आकलन साफ है: उत्तर एशिया—खासकर जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान—की अमेरिकी राजस्व पर सबसे ज्यादा निर्भरता है। उनके मॉडल के हिसाब से हर 5 प्रतिशत अंक की टैरिफ बढ़ोतरी पर क्षेत्रीय कमाई लगभग 1% घट सकती है। लेकिन ये चोट एक समान नहीं होगी। जिन कंपनियों की सप्लाई चेन चेन्ड है और अमेरिकी एंड-डिमांड पर ज्यादा निर्भरता है, उन पर दबाव ज्यादा दिखेगा; जिनकी घरेलू या क्षेत्रीय बिक्री मजबूत है, वे झटका बेहतर ढंग से झेल सकती हैं।

अब टैरिफ डीटेल पर आते हैं। जापान, कंबोडिया और कुछ अन्य देशों के लिए 24–49% की रेंज सामने आई है। बिना ट्रेड डील वाले देशों को टॉप-स्लैब का जोखिम ज्यादा है। चीन के लिए अलग समय-सीमा और ऊंची बैंड ने एशिया की चिंता बढ़ाई, क्योंकि अगर बीजिंग जवाबी कदम उठाता है तो सप्लाई चेन की लागत और ज्यादा ऊपर जाएगी। शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और कच्चे माल पर भी सेकंड-ऑर्डर इफेक्ट्स बनेंगे—इन्श्योरेंस प्रीमियम से लेकर वेयरहाउसिंग तक सबकी कीमतें बदलती हैं।

तो फिर हैंग सेंग में इतनी ताकत क्यों? दो वजहें दिखती हैं। पहली, चीनी टेक और AI-लिंक्ड शेयरों में रैली—मेनलैंड से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों ने पोजिशन बढ़ाई। दूसरी, वैल्यूएशन पहले से दबे थे, इसलिए बाउंस तेज हुआ। बाजार ने यहां ये दांव खेला कि घरेलू पॉलिसी सपोर्ट और AI-साइकिल की आय संभावनाएं टैरिफ-हेडविंड को कुछ हद तक बेअसर कर सकती हैं।

रिस्क-ऑन/रिस्क-ऑफ की ये रस्साकशी करेंसी मार्केट में भी दिखी। डॉलर के कमजोर होने की उम्मीद और फेड के ईज़िंग साइकिल की संभावना ने एशियाई एसेट्स को आंशिक सहारा दिया। अगर अमेरिकी शॉर्ट-टर्म रेट्स नीचे आते हैं, तो यील्ड की तलाश में पैसा एशिया की तरफ मुड़ सकता है। यहीं पर बैंकिंग और हाई-डिविडेंड पॉकेट्स में ग्रैविटी मिलती है—टैरिफ का नुकसान, लोअर-रेट्स से मिली राहत के सामने बैलेंस होता दिखा।

कुल मिलाकर, एशियाई बाजार एक साथ दो कहानियां सुन रहे हैं—टैरिफ की रुकावट और टेक-साइकिल की रफ्तार। जहां एक्सपोर्ट-हैवी कंपनियां गाइडेंस पर पुनर्विचार कर रही हैं, वहीं AI, क्लाउड और सेमी-कैपेक्स थीम में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है। यही वजह है कि इंडेक्स-लेवल तस्वीर उतनी सरल नहीं दिखती जितनी हेडलाइन गिरावट बताती है।

निवेश का नक्शा: दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत की ओर रुख

निवेश का नक्शा: दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत की ओर रुख

Reuters NEXT Asia समिट में कॉर्पोरेट नेताओं ने साफ इशारा दिया—चीनी कंपनियां उत्पादन का विविधीकरण तेज कर रही हैं और दक्षिण-पूर्व एशिया में कैपेक्स बढ़ रहा है। वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया में इलेक्ट्रॉनिक्स असेम्बली, ऑटो-पार्ट्स और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की नई क्षमताएं बन रही हैं। एफडीआई फ्लोज़ का झुकाव भी यहीं दर्ज हो रहा है—कम टैरिफ रिस्क, तेज श्रम-उपलब्धता और प्रोत्साहन नीतियां इसे सपोर्ट दे रही हैं।

भारत इस बदलाव का बड़ा लाभार्थी बनकर उभरा है। निवेशकों के लिए यह सिर्फ ‘डिप्लोमैटिक हेज’ नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल दांव है—जैसा कि QI Group के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन विजय एसवरन ने कहा, यह “डिलिबरेट डाइवर्सिफिकेशन” है। 2024 में ASEAN की 4.6% ग्रोथ—अमेरिका और यूरोप से काफी आगे—ने इस थीसिस को बल दिया। भारत में PLI जैसी नीतियां, बड़ा घरेलू बाजार और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर सोलर और फार्मा तक, सप्लाई चेन के हिस्से खींच रहे हैं।

मार्केट स्ट्रैटेजिस्ट्स इसे तीन माइग्रेशन ट्रेंड्स में बांटते हैं: पहला, फाइनल असेम्बली दक्षिण-पूर्व एशिया/भारत में; दूसरा, हाई-एंड कंपोनेंट्स उत्तर एशिया में; तीसरा, सेल्स और कस्टमर सपोर्ट अमेरिका/यूरोप के करीब। इस “बारबेल” मॉडल में टैरिफ की लागत कुछ हद तक न्यूट्रलाइज होती है, लेकिन मार्जिन्स पर प्रेशर बना रहता है जब तक सप्लाई चेन पूरी तरह फिर से सेट नहीं हो जाती।

कंपनियां अपने-अपने टूलकिट चला रही हैं—कॉन्ट्रैक्ट्स में री-प्राइसिंग क्लॉज़, मल्टी-करेंसी इनवॉयसिंग, इन्वेंट्री बफर्स और पास-थ्रू प्राइसिंग। सीएफओ गाइडेंस में कैपेक्स का फ्रंट-लोडिंग दिख रहा है ताकि उत्पादन स्थानांतरण की लागत समय पर कैप्चर हो सके। इस बीच, कई फर्में अमेरिकी बाजार के लिए वैकल्पिक रूट्स—मेक्सिको या कनाडा में फिनिशिंग—भी देख रही हैं ताकि टैरिफ इम्पैक्ट कम किया जा सके।

जो सेक्टर फिलहाल कम जोखिम में हैं, वे घरेलू मांग-आधारित हैं—यूटिलिटीज, टेलिकॉम, कुछ बैंक और लोकल रियल एस्टेट। इनकी आय अमेरिकी मांग पर नहीं, बल्कि घरेलू उपभोग और स्थानीय रेट-साइकिल पर ज्यादा टिकी है। अगर फेड दरें घटाता है और डॉलर नरम पड़ता है, तो एशिया में बॉन्ड यील्ड स्थिर रह सकती हैं, जिसका फायदा इन पॉकेट्स को मिलेगा।

पर तस्वीर पूरी तरह गुलाबी नहीं। अनिश्चितता लंबी चली तो बिजनेस इन्वेस्टमेंट और कंज्यूमर सेंटिमेंट दोनों पर असर पड़ेगा। ऑर्डर बुक्स में देरी, कैपेक्स प्लान्स का रिव्यू और क्रेडिट कॉस्ट का रिस्क—ये तीन सिरदर्द पहले दिखते हैं। मिड-कैप एक्सपोर्टर्स की बैलेंस शीट पर असर ज्यादा होगा क्योंकि उनके पास प्राइसिंग पावर सीमित है।

बाजार किन संकेतों पर नजर रखेगा? पहला, टैरिफ का अंतिम गैजेट—कौन-सी दरें कब से लागू होंगी और किन उत्पादों पर? दूसरा, संभावित छूटें—क्या कुछ क्रिटिकल कंपोनेंट्स के लिए एक्सेम्प्शन मिल सकते हैं? तीसरा, रिटालिएशन का स्केल—यदि चीन या अन्य देशों ने जवाबी शुल्क लगाए तो कौन-से सेक्टर सबसे पहले प्रभावित होंगे? चौथा, फेड की राह—कट्स की गति, डॉलर का ट्रैक और लिक्विडिटी का रुख।

इक्विटी फ्लोज़ भी कहानी बना रहे हैं। पैसिव ETFs में आउटफ्लो के साथ-साथ थीमैटिक फंड्स—AI, सेमी-कैपेक्स, ऑटो-इलेक्ट्रिफिकेशन—में चुनिंदा खरीदारी दिख रही है। वैल्यू बनाम ग्रोथ की बहस फिर से गर्म है: जहां वैल्यू पॉकेट्स प्रोटेक्शन दे रहे हैं, वहीं ग्रोथ नामों में अर्निंग्स की दृश्यमानता उन्हें महंगा होते हुए भी आकर्षक बनाए रखती है।

ऑस्ट्रेलिया का ASX कमोडिटी-लिंक्ड इकॉनमी के कारण अलग तरह की वोलैटिलिटी दिखा रहा है—टैरिफ से ग्लोबल ट्रेड स्लो होता है तो मेटल्स की मांग पर असर, पर डॉलर नरम पड़े तो कमोडिटी कीमतों को सपोर्ट मिलता है। साउथ कोरिया में मेमोरी-चिप साइकिल की रिकवरी बड़ी थीम है—अगर अमेरिकी मांग में ब्रेक लगा, तो इन्वेंट्री नॉर्मलाइजेशन लंबा खिंच सकता है। जापान में ऑटो और इंडस्ट्रियल्स पर ज्यादा दबाव है, जबकि बैंकिंग शेयर रेट-स्प्रेड्स के सहारे संतुलन दे रहे हैं।

हांगकांग में YTD 25% की रैली अपने आप में संदेश है—नीचे वैल्यूएशन, पॉलिसी सपोर्ट और AI-टेलविंड का कॉम्बो असर कर रहा है। पर ध्यान रहे, अगर टैरिफ विवाद लंबा चला, तो वैल्यूएशन रेटिंग-अप की स्पेस सीमित हो सकती है। निवेशक यहां अर्निंग्स डिलिवरी पर ज्यादा सख्त नजर रखेंगे—टॉपलाइन ग्रोथ और मार्जिन एक्सपैंशन दोनों की कसौटी पर।

अगले कुछ हफ्ते इवेंट-हैवी हैं—टैरिफ का नियम-पुस्तिका, कंपनियों का क्वार्टरली अपडेट, और सेंट्रल बैंकों के संकेत। अगर किसी तरह का सॉफ्ट-लैंडिंग रास्ता बनता है—जैसे सीमित दायरे में टैरिफ, फेड की सहज राह और डॉलर में नरमी—तो एशिया में रिस्क-टेकर्स फिर से लौट सकते हैं। वरना, डिफेंसिव रोटेशन और सप्लाई चेन-फ्रेंडली मार्केट्स में ओवरवेट रुख कुछ समय तक बना रह सकता है।

फिलहाल तस्वीर स्पष्ट यही कहती है: टैरिफ शॉक ने एशिया को चौंकाया, लेकिन टेक-चक्र, पॉलिसी और रेट्स का मिश्रण गिरावट को सीधी रेखा बनने नहीं दे रहा। यही वजह है कि इंडेक्स हर दिन नई कहानी लिख रहे हैं—एक तरफ डर, दूसरी तरफ उम्मीद।

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