स्टॉक स्प्लिट क्या है और आपको क्यों जानना चाहिए

स्टॉक स्प्लिट का मतलब सरल है: कंपनी अपने एक शेयर को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट देती है। इससे हर शेयर का अंकित मूल्य घटता है लेकिन कंपनी का कुल बाजार पूँजीकरण नहीं बदलता। उदाहरण: 1:2 स्प्लिट में आपके 1 शेयर की जगह 2 हो जाते हैं और कीमत आधी हो जाती है।

किसी कंपनी के लिए यह आमतौर पर शेयरों की कीमत को कम करके अधिक निवेशकों तक पहुँचने का तरीका होता है। बड़ी कीमत वाले शेयर छोटे निवेशकों के लिए महँगे लगते हैं। स्प्लिट से दाम सस्ते दिखते हैं और तरलता बढ़ सकती है।

स्टॉक स्प्लिट के प्रकार

आम तौर पर दो तरह के स्प्लिट होते हैं: फॉरवर्ड (सामान्य) स्प्लिट और रिवर्स स्प्लिट। फॉरवर्ड स्प्लिट में शेयरों की संख्या बढ़ती है, जैसे 1:5 स्प्लिट। रिवर्स स्प्लिट में शेयरों की संख्या घटती है, जैसे 1:10, और कीमत बढ़ती दिखती है पर मार्केट कैप वही रहता है।

स्प्लिट को बोनस शेयर से मत मिलाइए। बोनस में कंपनी रिज़र्व से फ्री शेयर देती है; दोनों के नतीजे अलग हो सकते हैं और टैक्स नियम भी भिन्न होते हैं।

निवेशक के लिए असर और क्या देखना चाहिए

स्प्लिट से अक्सर शेयर का छोटा सा ब्रेकआउट देखने को मिलता है क्योंकि ज्यादा लोग खरीद पाते हैं। पर ध्यान रहे: स्प्लिट से कंपनी की फंडामेंटल वैल्यू नहीं बदलती। अगर कंपनी कमजोर है तो स्प्लिट सिर्फ कीमत को आकर्षक दिखाने जैसा हो सकता है।

अगर आप निवेशक हैं तो स्प्लिट पर ये बातें चेक करें: कंपनी का रेवेन्यू और प्रॉफिट ट्रेंड कैसा है, मैनेजमेंट की प्लानिंग क्या है, और स्प्लिट के पीछे कारण क्या बताया गया है। केवल स्प्लिट देखकर खरीदारी करने से बचें।

टाइमिंग के बारे में सवाल अक्सर आता है — क्या स्प्लिट के तुरंत बाद खरीदना चाहिए? कोई निश्चित नियम नहीं है। छोटा निवेशक होने पर स्प्लिट से पहले या बाद में खरीदना दोनों सही हो सकता है, पर लंबी अवधि के लिए फंडामेंटल देखें।

स्प्लिट की घोषणा के बाद नोटिस में दिए रिकॉर्ड डेट और एक्स-स्प्लिट डेट पर ध्यान दें। ब्रोकर्स और एक्सचेंज पर ये अपडेट मिल जाते हैं। कुछ मामलों में फ्रैक्शनल शेयर्स बन सकते हैं; ब्रोकर्स उन्हें कैश या समायोजित शेयर के रूप में हैंडल करते हैं।

टैक्स का असर भारत में सामान्यता यही है कि स्प्लिट से कैपिटल गेन नियम सीधे प्रभावित नहीं होते जब तक कि कोई बोनस या शेयर स्वैप जैसा कॉम्बिनेशन न हो। पर बड़ी corporate action में टैक्स सलाहकार से बात कर लें।

कहानी आसान है: स्प्लिट कीमत को बदलता है, कंपनी की असलियत नहीं। निवेश करें तो कंपनी की कमाई, विकास और जोखिम समझकर करें। एक्सचेंज नोटिफिकेशन और कंपनी के रिलीज़ पढ़ें — यही सबसे उपयोगी तरीका है।