द्रौपदी मुर्मू: भारत की पहली महिला राष्ट्रपति और उनकी अनोखी यात्रा
जब भारत ने अपनी पहली महिला राष्ट्रपति का चुनाव किया, तो द्रौपदी मुर्मू ने सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के सपनों को साकार किया। द्रौपदी मुर्मू, भारत की 15वीं राष्ट्रपति और पहली आदिवासी महिला जिन्होंने राष्ट्रपति का पद संभाला, असल में एक छोटे से झारखंड के गाँव से आई हैं, जहाँ बचपन में उनके पास स्कूल तक पहुँचने के लिए कई किलोमीटर चलना पड़ता था। यही जड़ें उनकी अटूट मेहनत और सादगी की पहचान बन गईं। उनकी यात्रा सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि लाखों ऐसी महिलाओं की है जिन्हें समाज ने कभी अपना नेता नहीं सोचा।
आदिवासी नेता, भारत के मूल निवासी समुदायों से आने वाले लोग जो राजनीति में अक्सर अनदेखे रहते हैं के लिए द्रौपदी मुर्मू एक प्रेरणा हैं। उन्होंने ओडिशा में शिक्षक के रूप में काम शुरू किया, फिर झारखंड के राज्य स्तर पर राजनीति में कदम रखा, और अंततः राष्ट्रपति बने। उनके जीवन में कोई भी बड़ा समर्थन नहीं था—न सम्पत्ति, न जाति का फायदा, न कोई राजनीतिक विरासत। सिर्फ लगन और अपने आप पर विश्वास। उनकी नेतृत्व शैली में दर्द, सहनशीलता और सादगी का अहसास है, जो आम आदमी के दिल तक पहुँचती है।
भारतीय राजनीति, एक ऐसा खेल जहाँ शक्ति, प्रभाव और पार्टी राजनीति अक्सर व्यक्तित्व को दबा देती है में उनका चुनाव एक नया मोड़ था। उन्होंने राष्ट्रपति के पद को केवल एक निर्वाचित पद नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक दायित्व के रूप में देखा। उनके भाषणों में आदिवासी समुदाय, महिलाओं और ग्रामीण भारत की आवाज़ हमेशा सुनाई देती है। यही वजह है कि जब भी उन्होंने बात की, लोगों ने अपने दिल से जवाब दिया।
उनकी कहानी बस एक राष्ट्रपति की नहीं, बल्कि एक ऐसी भारत की है जो अब अपने अलग-अलग लोगों को अपना नेता बना सकता है। आप जिस भी खबर में द्रौपदी मुर्मू का जिक्र है—चाहे वो उनके राष्ट्रीय भाषण हों, आदिवासी योजनाओं पर उनकी बातचीत हो, या फिर उनके निजी जीवन की छोटी-छोटी बातें—वो सब एक ही संदेश देती हैं: अगर आप लगन से काम करें, तो कोई भी सीमा आपके लिए असंभव नहीं।
इस पेज पर आपको द्रौपदी मुर्मू से जुड़ी सभी ताज़ा खबरें, उनके निर्णयों का प्रभाव, और उनकी नेतृत्व शैली के बारे में विश्लेषण मिलेंगे। यहाँ आपको वो सब मिलेगा जो आपको उनकी असली कहानी समझने में मदद करे।
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