वित्तीय घाटा क्या है और क्यों मायने रखता है

वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit) का मतलब है सरकार की कुल व्यय और उसकी कुल आय में अंतर। सरल शब्दों में, जब सरकार जितना खर्च करती है उससे कम टैक्स और आमदनी आती है तो अंतर को वित्तीय घाटा कहते हैं। यह आंकड़ा शेयर बाजार, ब्याज दर और अर्थव्यवस्था की सर्जनशीलता पर असर डालता है।

यह कैसे नापा जाता है और मुख्य प्रकार

आम फॉर्मूला: वित्तीय घाटा = कुल व्यय - कुल प्राप्तियाँ (बिना उधार)। इसे अक्सर GDP के प्रतिशत के रूप में बताया जाता है ताकि तुलना आसान हो। तीन महत्वपूर्ण शब्द याद रखें:

1. राजस्व घाटा — नियमित आय से मिलने वाले खर्चों (सैलरी, सब्सिडी) में कमी।

2. प्राथमिक घाटा — वित्तीय घाटा माइनस ब्याज भुगतान; यानी सरकार के ब्याज देने के बाद बचा असल घाटा।

3. कुल ऋण — लगातार घाटा बढ़ने से सरकार का कुल कर्ज भी बढ़ता है और ब्याज का बोझ बड़ा होता है।

विक्त कारण और असर — सीधे और साफ

वित्तीय घाटा बढ़ने के सामान्य कारण: आर्थिक वृद्धि धीमी होना, टैक्स कलेक्शन कम होना, सशक्त सब्सिडी या बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च। कभी-कभी आकस्मिक घटनाएं — जैसे प्राकृतिक आपदा या आर्थिक संकट — भी खर्च बढ़ा देती हैं।

घाटा बढ़ने के असर साफ दिखते हैं: सरकार को ज्यादा उधार लेना पड़ता है, जिससे बॉण्ड की पेशकश बढ़ती है और ब्याज दर ऊपर जा सकते हैं। इससे निजी क्षेत्र के लिए ऋण महंगा हो सकता है (crowding out)। अगर उधार बहुत बढ़े तो क्रेडिट रेटिंग पर असर पड़ता है और विदेशी निवेशक सतर्क हो सकते हैं।

लोगों के लिए इसका मतलब? महंगाई, सरकारी सेवाओं पर कटौती, या टैक्स बढ़ने की संभावना। छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स या सब्सिडी में बदलाव सीधे आपकी जेब पर असर डाल सकते हैं।

कम करने के उपाय भी स्पष्ट हैं: टैक्स बेस चौड़ा करना, गैर-जरूरी खर्च सीमित करना, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की दक्षता बढ़ाना, और निवेश को प्राथमिकता देना। आरबीआई का रोल भी अहम है — कभी-कभी वह बाजार में तरलता नियंत्रित कर ब्याज दरों और मुद्रास्फीति को संतुलित करता है।

अगर आप खबर पढ़ते हैं तो किन संकेतकों पर ध्यान दें: वित्तीय घाटा % of GDP, प्राथमिक घाटा, ब्याज भुगतान का हिस्सा, और सालाना शुद्ध बाजार उधार। बजट दस्तावेज़, वित्त मंत्री की घोषणाएँ और RBI की रिपोर्टें यही जानकारी देती हैं।

अंत में, वित्तीय घाटा सिर्फ सरकारी नंबर नहीं है। यह रोज़मर्रा की अर्थव्यवस्था और आपकी योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। खबरें पढ़ते वक्त इन सरल संकेतकों को समझना आपको आर्थिक फैसलों में मदद देगा।